Report by : Dr. Ravindra Rana
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ऑनर किलिंग पर जगमती सांगवान का करारा सवाल, अमीरों के बच्चों की लव मैरिज मंजूर तो गरीबों से परहेज क्यों?

“बच्चों की जान नहीं ले सकते”, ऑनर किलिंग, लव मैरिज और समाज की सोच पर खुलकर बोलीं जगमती सांगवान

डॉ. रवीन्द्र राणा, सियासी पंचायत

डॉ. रवीन्द्र राणा: इस वक्त हमारे साथ हैं डॉ. जगमती सांगवान जी, जो बहुत बड़ी सोशल एक्टिविस्ट हैं। ऑनर किलिंग, महिलाओं के समानता के अधिकार, भ्रूण हत्या, लोकतांत्रिक मुद्दों और सामाजिक मुद्दों को लेकर मैम ने लंबा काम किया है। इन सभी क्षेत्रों में काम करने का लगभग चार दशक का अनुभव है। मैम अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी रही हैं। आपका हमारे चैनल पर बहुत स्वागत है।

डॉ. जगमती सांगवान: हां, थैंक यू रविंद्र। बहुत-बहुत धन्यवाद। आप और आपका चैनल हमेशा ही इन मुद्दों पर बहुत रोशन खयाली से बात करते हैं।

डॉ. रवीन्द्र राणा: शुक्रिया मैम। मैंने आपका भाषण सुना। आज आप मेरठ में थीं। एक अच्छा कार्यक्रम हुआ, जिसमें इतिहास की बातें हुईं, समाज की बातें हुईं, स्वतंत्रता आंदोलन की बातें हुईं और इस पर चर्चा हुई कि आजादी के बाद भारतीय समाज को किस तरह बदलना चाहिए था, लेकिन हम उस तरह नहीं बदल पाए।

आपने इस पर चिंता जाहिर की। आपने कहा कि महिलाओं, दलितों, पिछड़ों और वंचितों को उस तरह का बराबरी का समाज नहीं मिल सका। आपको क्या लगता है, अब क्या संभावनाएं हैं? हम 2026 में खड़े हैं। आने वाले समय को आप किस तरह देखती हैं?

डॉ. जगमती सांगवान: देखिए, अभी 2026 में जिस तरह की नीतियां लागू की जा रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि हमारी सरकार कॉरपोरेट के साथ मिलकर कॉरपोरेट और सांप्रदायिक गठजोड़ बना रही है। आम आदमी, गरीब-गुरबे, महिलाएं, दलित और अल्पसंख्यक, इन सबके हितों के खिलाफ काम हो रहा है।

महंगाई इतनी ज्यादा बढ़ रही है। हम बच्चों को पढ़ाते हैं कि उन्हें नौकरी मिलेगी, लेकिन कहीं नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लाखों पद सरकारी विभागों में खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालयों में जाइए तो विभाग खाली हैं, शिक्षक नहीं हैं।

एक तरफ नौजवान बेरोजगार बनाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ खाली पद नहीं भरे जा रहे हैं। इससे जनसेवा भी नहीं हो पा रही है।

इसी तरह हमारी खेती को लेकर भी चिंता है। ट्रेड डील के माध्यम से ट्रंप और अमेरिका के साथ जिस तरह का समझौता किया जा रहा है, वह हमारी खेती-बाड़ी और उससे मिलने वाले रोजगार को तबाह करने वाला है।

फिलहाल जो राइट टू वोट वाला आंदोलन चल रहा है, उसका केंद्र जवाबदेही सुनिश्चित करना है। अगर हम इस आंदोलन के माध्यम से सरकार की जवाबदेही तय करने में सफल हो पाते हैं, तो हो सकता है कि कुछ बदलाव सकारात्मक दिशा में जाएं।

अभी पेपर लीक हो रहे हैं। चाहे नौकरियों की परीक्षाएं हों या बच्चों की परीक्षाएं, हमें हैरानी होती है कि सरकार एक परीक्षा भी ठीक से आयोजित नहीं कर सकती। यह उनकी कार्यक्षमता का स्तर है। यह कैसी कार्यक्षमता है?

आज चारों तरफ का माहौल बहुत चिंताजनक है।

डॉ. रवीन्द्र राणा: आपको क्या लगता है कि इसमें बदलाव कैसे आ सकता है? अभी कई प्रदेशों में चुनाव होने हैं। 2027 में उत्तर प्रदेश के चुनाव भी नजदीक हैं। उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में भी चुनाव होने हैं। जमीन पर आपको क्या तस्वीर दिखाई दे रही है?

डॉ. जगमती सांगवान: जमीन पर हमारे युवाओं ने आवाज उठानी शुरू की है। उनकी बातचीत का केंद्र यह है कि हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं, विकास की राजनीति होनी चाहिए।

विकास भी ऐसा होना चाहिए, जिसमें समाज के सभी तबकों को शामिल किया जाए। किसान, मजदूर, महिलाएं, दलित और युवा, सभी की आकांक्षाओं को उसमें जगह मिले।

अगर हम इन सबको शामिल करते हुए आंदोलन की दिशा में आगे बढ़ते हैं और सफलता हासिल करते हैं, तो आने वाले दिनों में और भी रास्ते खुलेंगे।

वरना लड़कियों की शिक्षा का सवाल है। स्कूल बंद किए जा रहे हैं। गांवों में लड़कियों के स्कूल दूर हो जाएंगे तो उनकी पढ़ाई छूटने लगेगी। अभी भी लड़कियां पढ़ाई छोड़ रही हैं।

हमारी लड़कियों ने खेलों में इतने मेडल हासिल किए हैं। लड़कों ने भी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन ग्रामीण परिवेश के बच्चे ज्यादातर खेलते हैं और गांवों में खेल सुविधाओं का अभाव है।

स्टेडियम के नाम पर चारदीवारी खड़ी कर दी जाती है, लेकिन वहां कोच नहीं होते, उपकरण नहीं होते। यह स्थिति है।

अगर जनता अलग-अलग स्तरों पर अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने लगे, तो हालात सुधर सकते हैं। जहां लोग सक्रिय नागरिक की भूमिका निभाते हैं, वहां हालात सुधर भी रहे हैं।

हमें सक्रिय रहना पड़ेगा। अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पहरेदारी करनी पड़ेगी। ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपना काम करते रहें और बाकी सरकार तथा अधिकारियों पर छोड़ दें।

अफसर और सरकार खुद कहते हैं कि जब तक बच्चा रोता नहीं, मां भी उसे दूध नहीं पिलाती। लेकिन यहां तो हम बोल भी रहे हैं, फिर भी हमारी आवाज नहीं सुनी जा रही। इसलिए हमें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय होना पड़ेगा।

डॉ. रवीन्द्र राणा: मैम, आपने सामाजिक मुद्दों पर बात की। खासतौर पर महिलाओं की बराबरी और शादी की व्यवस्था पर। आपने कहा कि शादी करने की पसंद व्यक्तिगत होती है, व्यक्तिगत फैसला होता है और उसमें समाज का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

पिछले डेढ़-दो दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में ऑनर किलिंग के कई मामले सामने आए। अब कुछ बदलाव भी दिखाई देते हैं। लव मैरिज और अरेंज मैरिज के बीच भी कई तरह के बदलाव हुए हैं।

लेकिन एक दूसरी स्थिति दिखाई दे रही है कि रिश्ते चल नहीं पा रहे हैं। मेरठ में पिछले दो-तीन महीनों में कई बड़े मामले हुए, जिनमें मौत की सजा तक सुनाई गई। एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स की चर्चा भी बढ़ रही है और परिवारों के भीतर असंतोष की स्थितियां हैं।

आपको क्या लगता है कि परिवार नाम की संस्था किस स्थिति में है? रिश्तों के बीच जो जुड़ाव होना चाहिए, वह क्यों कमजोर हो रहा है और उसे कैसे मजबूत किया जा सकता है?

डॉ. जगमती सांगवान: देखिए, समाज के अंदर जो संकट है, परिवार की संस्था भी उसका एक हिस्सा है। समाज में जो हो रहा है, वही परिवारों में भी दिखाई दे रहा है।

असल में रिश्तों का बिखराव पूरे समाज के अंदर है। आज कोई राजनेता एक पार्टी से चुनाव जीतकर जाता है और कल करोड़ों रुपये लेकर दूसरी पार्टी में चला जाता है। बीजेपी में भी बहुत सारे दलबदल करने वाले लोग हैं।

इसी तरह घरों के अंदर भी रिश्तों में तनाव है।

एक संकट यह है कि युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा। खेती में काम खत्म होता जा रहा है। ऐसे में गुस्सा बढ़ रहा है। लोग आपस में ही लड़ने लगते हैं।

इस गुस्से का असली जुड़ाव उन नीतियों से है, जो हमारे यहां लागू की जा रही हैं। लेकिन लोग उस गुस्से को रिश्तों के भीतर व्यक्तियों पर निकालते हैं। वे हर समस्या को व्यक्तिगत बनाकर उसका निर्मम तरीके से समाधान करना चाहते हैं।

आप घर-परिवारों में भी विमर्श शुरू कीजिए। अपने बच्चों से बात कीजिए, अपने बड़ों से बात कीजिए। बच्चे बड़ों से मार्गदर्शन लें और बड़े भी बच्चों को समय दें।

सबको साथ बैठकर समझना चाहिए कि समाज में रहने के हमारे तौर-तरीके क्या हैं।

परिवार को लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाए तो उसमें शांति और खुशहाली होगी। परिवार के भीतर महिलाएं और बच्चे भी इसी की मांग कर रहे हैं।

लेकिन हम परिवारों को पितृसत्तात्मक तरीके से चलाना चाहते हैं। अब उससे काम नहीं चलेगा।

अगर बच्चे अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं तो आप उन्हें समझा सकते हैं। वे समझ जाएं तो बहुत अच्छा है। लेकिन अगर वे अपनी पसंद पर कायम रहते हैं, तो आप उनसे नाराज हो सकते हैं, रिश्ता खत्म कर सकते हैं, लेकिन उनकी जान नहीं ले सकते।

हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं किया जाना चाहिए। कोई विवाद हो, विचारों का मतभेद हो, उसे मनभेद में मत बदलिए। बातचीत कीजिए। हर समस्या का समाधान विमर्श और बातचीत से निकल सकता है।

डॉ. रवीन्द्र राणा: आपने अंतरजातीय विवाह की बात की। डॉ. भीमराव आंबेडकर का हवाला दिया कि वे चाहते थे कि समाज समतामूलक बने और ऐसा तब हो सकता है, जब शादियां जाति की सीमाओं से बाहर हों।

आंबेडकर ने आजादी से पहले ही इस तरह के समाज की कल्पना की थी। अब 2026 में भारतीय समाज को आप इस मामले में किस दिशा में बढ़ता हुआ देखती हैं?

डॉ. जगमती सांगवान: अगर अपनी पसंद से शादी करने के अधिकार की बात करें, तो हमारे यहां हालात में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

हालांकि चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं ने उदाहरण प्रस्तुत किए। उनके बेटे-बेटियों ने जहां शादी करनी चाही, उन्होंने उन्हें इजाजत दी और उनकी इच्छा का सम्मान किया।

हम देखते हैं कि तमाम नेताओं के बच्चे अपनी पसंद से शादी करते हैं। वे जरूरी नहीं कि पारंपरिक तरीके से ही शादी करें। लेकिन जब वे अपनी पसंद से शादी करते हैं तो समाज के सामने आदर्श बन जाते हैं।

वहीं, किसी गरीब परिवार का लड़का या लड़की अपनी पसंद से शादी कर ले तो लोग उनकी जान के पीछे पड़ जाते हैं।

हम समझते हैं कि अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार भी आजादी के बाद व्यक्ति और रिश्तों के विकास के लिए जरूरी था। इसलिए इसे सम्मान की नजर से देखना चाहिए।

हम यह नहीं कह रहे कि किसी को कुछ करने के लिए उकसाया जाए। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि किसी की जान नहीं ली जानी चाहिए। किसी को मारा नहीं जाना चाहिए।

हम अपराधी क्यों बनें? बैठकर उनके साथ शांति से बात कीजिए। समझाने और समझने की कोशिश कीजिए।

अगर इसके बाद भी विचार नहीं मिलते तो उनके रिश्तों का अपना रास्ता हो सकता है और हमारा अपना रास्ता।

डॉ. रवीन्द्र राणा: तलाक के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। आप इसे कैसे देखती हैं?

डॉ. जगमती सांगवान: तलाक इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि अब लड़कियां पढ़ी-लिखी हैं और अपना मान-सम्मान चाहती हैं।

लेकिन हमारे यहां नशा भी बढ़ रहा है। बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। युवाओं के आत्मविकास के जो रास्ते हो सकते हैं, जैसे खेल, साहित्य और कला, वे भी बंद होते जा रहे हैं।

इन परिस्थितियों में आपसी रिश्तों के भीतर तनाव पैदा हो रहा है।

तनाव पैदा होने पर बातचीत के माध्यम से उसका समाधान निकालने की शैली हमने अभी तक परिवारों में विकसित नहीं की है। हमें अपने परिवारों के भीतर संवाद की शैली विकसित करने की जरूरत है।

अगर फिर भी बात नहीं बनती और अलग होना पड़ता है, तो कानून ने सम्मानजनक तरीके से अलग होने की व्यवस्था की है। जरूरत थी, इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई।

आप कानून के तहत अपना मामला लड़ सकते हैं। हमें लगता है कि अगर रिश्तों में सही तरीके से काउंसलिंग हो जाए, लोग किसी संस्था या मध्यस्थता केंद्र के पास जाएं, तो लगभग 80 प्रतिशत मामलों का समाधान बातचीत से निकल सकता है।

लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त मंच नहीं है, जहां रिश्तों में तनाव या विवाद होने पर लोगों की मदद की जा सके और उन्हें सही रास्ता मिल सके।

डॉ. रवीन्द्र राणा: आप अंतरराष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रही हैं और आज सामाजिक मुद्दों के लिए संघर्ष कर रही हैं। इस यात्रा में आपको निजी स्तर पर भी संघर्ष झेलने पड़े।

जब आप युवा थीं, तब परिवार की अपेक्षा होती है कि बेटी नौकरी करेगी, शादी करेगी और घर बसाएगी। लेकिन आपने पूरे समाज के लिए लड़ाई लड़ने का फैसला किया। यह कितना आसान या मुश्किल था?

डॉ. जगमती सांगवान: देखिए रवि, मैं खिलाड़ी हूं। हमारे गांव की लड़कियों की टीम बहुत अच्छी थी। लेकिन जब लड़कियों को घर से बाहर शहर में पढ़ने भेजने की बारी आई, तो ज्यादातर लड़कियों को घरों में बंद कर दिया गया। उनकी शादियां कर दी गईं।

जब हम दूसरे देशों में खेलने गए तो हमने देखा कि वहां की लड़कियां खेल में जिन तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं, उनमें हमारे गांव की लड़कियां भी महारत हासिल कर सकती थीं। लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला।

वहीं से हमारे भीतर यह इच्छा पैदा हुई कि हम ऐसा काम करें, जिससे लड़कियों की प्रतिभा को विकसित होने का अवसर मिले और समाज उन पर बंदिशें न लगाए।

हम विश्वविद्यालय परिसर में पढ़ रहे थे। वहां तरह-तरह के विचार सुनने और समझने को मिलते थे।

हमें यह भी लगा कि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल पाए, क्योंकि कुछ लोगों ने समाज के लिए काम किया था। उनके प्रयासों की बदौलत हमें आगे बढ़ने का मौका मिला।

इसलिए हमने भी काम करना शुरू किया।

लेकिन जब आप ऐसे तबके के लिए काम करते हैं, जिसकी महिलाओं को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार नहीं मिलता, तो रास्ते में बहुत बाधाएं आती हैं।

आपको सिर्फ प्रशंसा नहीं मिलती। जब आप समाज की किसी कुरीति के खिलाफ बोलते हैं, तो आपका समाज, परिवार और समुदाय के लोग भी कई बार नाराज हो जाते हैं।

राजा राममोहन राय ने जब सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई, तो उनके परिवार के लोगों ने भी नाराजगी जताई थी। सामाजिक दबाव बहुत ज्यादा था।

लेकिन राजा राममोहन राय पीछे नहीं हटे। उन्हें लगता था कि उनकी बात सही है। उन्होंने अपने समाज और परिवार का गुस्सा सहन किया।

हम भी यही समझते हैं कि जब हम ऑनर किलिंग के खिलाफ बोलते हैं, तो हम किसी को यह नहीं कह रहे कि आप यह करें या वह करें। हम सिर्फ इतना कहते हैं कि अपने हाथ खून से मत रंगिए।

कुछ प्रतिक्रियावादी ताकतें हमारी छवि खराब करती हैं। वे कहती हैं कि हम लोगों को उकसाते हैं। जबकि हमारा संदेश केवल इतना है कि किसी की हत्या मत कीजिए।

सामाजिक काम करते हुए कई बार नाराजगियां होती हैं। कई ऐसे दौर भी आते हैं, जब लोग एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं।

उदाहरण के लिए, जब हम खाप पंचायतों से कहते थे कि ऑनर किलिंग नहीं होनी चाहिए और हमें कानून के साथ खड़ा होना चाहिए, तो एक दौर में वे हमसे बहुत नाराज थे।

लेकिन किसान आंदोलन के दौरान हम सबने कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। इससे हमें एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझने का अवसर मिला।

आज खेती-बाड़ी और देश में हो रही ट्रेड डील जैसे कई मुद्दों पर भी हम साथ खड़े हैं।

समाज परिवर्तन का रास्ता आसान नहीं होता। इसमें मुश्किलें आती हैं। कई बार लगता है कि पैर डगमगाने लगे हैं। लेकिन अगर आपकी बात सही है और आप अपने रुख पर टिके रहते हैं, तो धीरे-धीरे लोग भी उस मुद्दे को समझने लगते हैं।

नाराजगी, गुस्से और आलोचना को भी हम अपने सामाजिक काम का हिस्सा मानकर चलते हैं। हर काम में सिर्फ अच्छी बातें नहीं होतीं। इन मुश्किलों का भी समाधान खोजना पड़ता है।

यही हमने इस रास्ते पर काम करते हुए सीखा है।

डॉ. रवीन्द्र राणा: मैम, हमसे बात करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच हमें समय दिया। एक आखिरी सवाल के साथ इस चर्चा को पूरा करेंगे। फिर आपसे कभी समय लेंगे।

लोक संस्कृति को बचाने की बात होती है। खासतौर पर गांवों में शहरीकरण बढ़ रहा है। गांवों के लोग शहरों की ओर जा रहे हैं और शहरी संस्कृति गांवों में पहुंच रही है।

भाषा, संस्कृति, खानपान, रहन-सहन और पहनावा, सब कुछ तेजी से बदल रहा है।

मैं देखता हूं कि आप अपनी लोकभाषा और उसके शब्दों का बखूबी इस्तेमाल करती हैं। आपको अपनी भाषा से कितना प्यार है और आप यह कैसे कर पाती हैं?

डॉ. जगमती सांगवान: असल में जब इन जटिल मुद्दों पर विमर्श करना होता है, तो हम सबसे पहले यह देखते हैं कि सामने कौन बैठा है।

अगर हमारे गांव के बहन-भाई बैठे हैं, तो जिस भाषा पर हमारी अच्छी पकड़ है, यानी हमारी लोकभाषा या मातृभाषा, उसमें हम कठिन से कठिन सवालों को आसानी से समझा सकते हैं।

दूसरी भाषा में शायद उतनी आसानी से नहीं समझा पाएं। इसलिए अगर सामने गांव के लोग बैठे हैं तो हम अपनी लोकभाषा में खुलकर बात करते हैं।

अगर सामने पढ़े-लिखे और शहरी पृष्ठभूमि के लोग हैं, तो हम हिंदी में बात करते हैं।

और अगर लगता है कि हमारी बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचनी चाहिए, तो हम अंग्रेजी में बोलने की कोशिश करते हैं। हो सकता है कि हमारी अंग्रेजी पूरी तरह सही न हो, क्योंकि यह हमारी भाषा नहीं है, विदेशी भाषा है।

लेकिन हम अपना संदेश पहुंचाना चाहते हैं। अगर हम अपना संदेश पहुंचाने में सफल हो जाते हैं, तो इतना काफी है। हर जगह भाषा पर महारत हासिल करना जरूरी नहीं है।

डॉ. रवीन्द्र राणा: यानी आप यह समझ लेती हैं कि जिन लोगों के बीच काम करना है, वे किस भाषा में बेहतर तरीके से जुड़ पाएंगे।

डॉ. जगमती सांगवान: हां, बिल्कुल। जैसे मुझे पता है कि मैं रविंद्र से हरियाणवी या अपनी लोकभाषा में भी बात करूंगी, तो वे समझ पाएंगे। अगर मेरी बात दूसरों को समझानी होगी, तो वे मेरी ओर से उसे समझा भी देंगे।

इस तरह हमें देखना पड़ता है कि सामने कौन है और उसे किस भाषा में बात बेहतर तरीके से समझ आएगी।

डॉ. रवीन्द्र राणा: बहुत-बहुत शुक्रिया मैम।

तो हमने डॉ. जगमती सांगवान जी से बात की। एक किसान परिवार की बेटी का बड़े सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उभरना, अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में अपनी पहचान बनाना और फिर समाज बदलने की लड़ाई में पूरे देश में मजबूती से खड़ा होना आसान काम नहीं है।

मैम, आपने यह कर दिखाया है और लगातार कर रही हैं। आप गांव-देहात की बेटियों के लिए ही नहीं, शहरों की बेटियों के लिए भी प्रेरणा हैं।

आपको यह बातचीत कैसी लगी? कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। अगर आप किसी बात से असहमत हैं, तो अपनी असहमति भी लिखिए।

अगली बार जब हम आपसे बात करेंगे, तो आपके सवालों को भी चर्चा में शामिल करेंगे। इससे हमारी बातचीत और समृद्ध होगी।

बहुत-बहुत शुक्रिया। हमारे चैनल सियासी पंचायत को सब्सक्राइब कर दीजिएगा। बेल आइकन दबाइए और नोटिफिकेशन ऑन रखिए।

धन्यवाद। नमस्कार।