सदियों पुरानी दोस्ती, विश्वास और भाईचारे की मिसाल! नफरत के दौर में मोहब्बत का पैगाम

एक बाक्खल करती है मां पार्वती की पूजा, दूसरी मां अन्नपूर्णा की आराधना। फिर होती है एक-दूसरे को दावत देने की बारी। न हलवाई, न बाजार से खाना, घरों की महिलाएं मिलकर बनाती हैं पकवान। घर-घर से जुटता है मट्ठा। हरियाणा के लाडवा से आकर बसा यह गांव शक्कर के लिए भी मशहूर है।
मेरठ के गांवों में आपने बहुत कुछ देखा होगा। कहीं पहलवानों की कहानियां मिलेंगी, कहीं राजनीति के पुराने किस्से, कहीं गन्ने के खेतों के बीच खड़े कोल्हू और कहीं गांव की चौपाल पर इतिहास सुनाते बुजुर्ग। लेकिन मेरठ के डालमपुर की कहानी इन सबसे कुछ अलग है।

यहां एक गांव है, दो बाक्खल हैं, पूजा के दो अलग-अलग अवसर हैं और एक ऐसी परंपरा है, जो तीन सौ साल से भी ज्यादा समय से गांव के लोगों को आपस में जोड़े हुए है।
जरा कल्पना कीजिए। गांव में एक पर्व आता है। एक बाक्खल के घरों में पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। दूसरी बाक्खल के लोगों को दावत का न्योता दिया जाता है। घरों की महिलाएं जुटती हैं। कढ़ी बनाने के लिए घर-घर से मट्ठा इकट्ठा किया जाता है। भोजन तैयार होता है और फिर एक बाक्खल के लोग दूसरी बाक्खल के साथ बैठकर भोजन करते हैं।
कुछ समय बाद फिर ऐसा ही अवसर आता है। इस बार मेजबानी करने की बारी दूसरी बाक्खल की होती है।

न कोई दिखावा, न किसी बड़े आयोजन की होड़। बस पुरखों की परंपरा, कुलदेवी की पूजा और पीढ़ियों से निभाया जा रहा भाईचारा।
यही है डालमपुर की असली कहानी।

दो बाक्खल, लेकिन रिश्तों में कोई दीवार नहीं

डालमपुर में पूनिया गोत्र के लोगों की दो बाक्खल हैं। एक छोटी बाक्खल और दूसरी बड़ी बाक्खल। गांव की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में इन दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है।
दोनों बाक्खल के पूजा-पर्व अलग हैं। उनके आयोजन की तिथियां भी अलग हैं। लेकिन इस अंतर के बीच एक ऐसी समानता है, जो इस गांव की पहचान बन गई है। दोनों एक-दूसरे को दावत देते हैं।
एक बार बड़ी बाक्खल के लोग छोटी बाक्खल की मेजबानी करते हैं। दूसरी बार छोटी बाक्खल के लोग बड़ी बाक्खल को भोजन कराते हैं।

यह सिलसिला केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं है। यह उस रिश्ते की याद दिलाता है, जिसमें परिवार अलग हो सकते हैं, घर अलग हो सकते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ाव बना रहता है।
आज के समय में जब छोटी-छोटी बातों पर परिवारों और समाजों के बीच दूरियां बढ़ जाती हैं, तब डालमपुर की यह परंपरा एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है। क्या विकास का अर्थ केवल बड़ी इमारतें, सड़कें और बाजार हैं, या उन रिश्तों को बचाए रखना भी विकास है, जो समाज को समाज बनाते हैं?

डालमपुर के लोगों ने अपनी परंपरा के जरिए इस सवाल का जवाब तीन सौ साल से अधिक समय से संभालकर रखा है।
कहानी के केंद्र में हैं दादा रणधीर सिंह

डालमपुर के इतिहास की कड़ियां गांव बसाने वाले दादा रणधीर सिंह से जुड़ती हैं। ग्रामीणों से मिली जानकारी के मुताबिक, उनके पूर्वज हरियाणा के लाडवा से आकर यहां बसे थे।
बताया जाता है कि दादा रणधीर सिंह माता पार्वती और मां अन्नपूर्णा की पूजा करते थे। परिवार की अगली पीढ़ी में पूजा की जिम्मेदारियां अलग-अलग सदस्यों को सौंपी गईं। इसी से छोटी और बड़ी बाक्खल की धार्मिक परंपराओं का संबंध बताया जाता है।
पूनिया गोत्र के लोग अपनी वंश परंपरा को भगवान शिव से जोड़कर देखते हैं। इस मान्यता के साथ माता पार्वती और मां अन्नपूर्णा की पूजा उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में विशेष स्थान रखती है।
दादा रणधीर सिंह के समय से जुड़ी परंपरा आज भी गांव में याद की जाती है। पीढ़ियां बदल गईं, परिवार बढ़ गए, गांव का आकार बदल गया, लेकिन कुलदेवी की पूजा और आपसी दावतों का सिलसिला कायम रहा।

किसी गांव का इतिहास केवल यह नहीं बताता कि वह कब बसा था। असली इतिहास यह भी बताता है कि उस गांव ने अपनी पुरानी मान्यताओं, रिश्तों और परंपराओं को कितनी मजबूती से संभालकर रखा।
डालमपुर की कहानी इसी मायने में खास है।
भाद्रपद की छठ और आश्विन की चतुर्दशी का इंतजार

डालमपुर की इस परंपरा में दो तिथियों का विशेष महत्व है।
ग्रामीणों के अनुसार, भाद्रपद मास की छठ को बड़ी बाक्खल के लोग पूजा करते हैं। गंगा स्नान के बाद कुलदेवता को जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद छोटी बाक्खल के लोगों को दावत दी जाती है।
फिर आती है आश्विन मास की चतुर्दशी।
इस दिन छोटी बाक्खल के लोग मां अन्नपूर्णा की पूजा करते हैं। कढ़ी और फुल्के का भोग लगाया जाता है। इसके बाद बड़ी बाक्खल के लोगों की मेजबानी की जाती है।

इस तरह दोनों बाक्खल के बीच मेजबानी का रिश्ता बना रहता है।
जरा इस परंपरा की खूबसूरती देखिए। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने पर्व हैं, अपनी पूजा है और अपनी जिम्मेदारी है। लेकिन जब दावत का समय आता है, तो केंद्र में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। केंद्र में होता है आपसी सम्मान।

एक बाक्खल दूसरी को बुलाती है। फिर दूसरी बाक्खल पहली को अपने यहां आमंत्रित करती है।

यह परंपरा जैसे कहती है कि भाईचारा केवल बातें करने से नहीं निभता। उसके लिए एक-दूसरे के घर जाना पड़ता है, साथ बैठना पड़ता है और एक-दूसरे का मान रखना पड़ता है।
इस दावत में हलवाई नहीं, गांव की महिलाएं हैं असली नायक
डालमपुर की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अभी बाकी है।
आमतौर पर किसी बड़े आयोजन में भोजन की जिम्मेदारी हलवाई संभालते हैं। लेकिन यहां परंपरा का अपना तरीका है। दावत के लिए बाहर से हलवाई बुलाने के बजाय घरों की महिलाएं मिलकर खाना बनाती हैं।
कढ़ी बनानी है तो मट्ठा किसी एक घर से नहीं आता। घर-घर से मट्ठा इकट्ठा किया जाता है। अलग-अलग घरों की महिलाएं भोजन तैयार करने में सहयोग करती हैं। इस काम में दूसरी बिरादरियों की महिलाएं भी भागीदारी करती हैं।
सोचिए, कढ़ी की एक बड़ी देग तैयार हो रही है। उसके लिए गांव के कई घरों से मट्ठा आया है। किसी ने भोजन बनाने में हाथ बंटाया, किसी ने दूसरी तैयारी संभाली। कोई अपने घर का काम निपटाकर पहुंचा, तो कोई दूसरे परिवार की मदद करने आ गया।
यहां भोजन की सामग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे तैयार करने का तरीका।
जिस कढ़ी में कई घरों का मट्ठा मिला हो, जिस भोजन को बनाने में अनेक परिवारों की महिलाएं जुटी हों और जिस दावत में दूसरी बाक्खल के लोग मेहमान बनकर आए हों, वह सिर्फ भोजन नहीं रह जाता। वह सामूहिक जीवन का उत्सव बन जाता है।
और शायद यही वजह है कि इस परंपरा की चर्चा केवल पूजा के कारण नहीं होती। इसके पीछे वह सामाजिक भावना है, जिसने गांव के लोगों को पीढ़ियों से एक-दूसरे से जोड़े रखा है।

जातियों की सीमाओं से आगे बढ़ती परंपरा
डालमपुर की सामाजिक संरचना में पूनिया गोत्र के साथ घंघास और ग्रेवाल गोत्र के लोग भी शामिल हैं। गांव में दूसरी बिरादरियों के परिवार भी रहते हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, पूजा और दावत के अवसरों पर जाटों के अलावा दूसरी बिरादरियों के लोगों को भी प्रसाद दिया जाता है। भोजन तैयार करने में विभिन्न जातियों की महिलाएं सहयोग करती हैं।
कुछ परिवार पूरे गांव को आमंत्रित करते हैं, तो कुछ अपने परिचितों और रिश्तेदारों को बुलाते हैं। समय के साथ बाहर से आने वाले रिश्तेदारों की भागीदारी भी बढ़ी है।
यानी गांव की परंपरा अपनी पुरानी धार्मिक जड़ों से जुड़ी होने के बावजूद सामाजिक मेलजोल का अवसर भी बनती है।
इसमें गांव की वह तस्वीर दिखाई देती है, जहां त्योहार सिर्फ अपने घर की खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि दूसरों को भी उन खुशियों में शामिल करने का माध्यम होते हैं।
डालमपुर की यह परंपरा किसी बड़े मंच से भाईचारे का संदेश नहीं देती। यहां संदेश घरों से निकलता है, महिलाओं की सामूहिक रसोई से गुजरता है और एक बाक्खल की दावत से दूसरी बाक्खल तक पहुंचता है।

पांच हजार की आबादी, लेकिन पहचान सिर्फ आंकड़ों से नहीं
आज डालमपुर की आबादी करीब पांच हजार बताई जाती है। गांव में लगभग ढाई हजार मतदाता हैं। गांव की पहचान खेती-किसानी, सामाजिक परंपराओं और यहां से जुड़े लोगों के कारण है।
गांव का इतिहास हरियाणा के लाडवा से आकर बसे पूर्वजों से जुड़ता है। पूनिया गोत्र के साथ घंघास और ग्रेवाल गोत्र के लोग भी यहां रहते हैं।
लेकिन डालमपुर को केवल उसकी आबादी, मतदाताओं या गोत्रों की संख्या से नहीं समझा जा सकता।
किसी गांव की पहचान उसके लोगों के रहन-सहन, रोजमर्रा के काम और पीढ़ियों से चले आ रहे व्यवहार से भी बनती है।
डालमपुर में यह पहचान एक तरफ खेती और कोल्हुओं में दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ कुलदेवी की पूजा और दोनों बाक्खल की दावतों में।

17 कोल्हू, गन्ने की मिठास और डालमपुर की शक्कर
अब बात उस मिठास की, जिसने डालमपुर को आसपास के इलाके में एक अलग पहचान दी है।

यह गांव अपनी शक्कर के लिए भी मशहूर है। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में करीब 17 कोल्हू हैं। गन्ने की खेती और उससे शक्कर बनाने का काम यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है।
डालमपुर की शक्कर मुरादनगर मंडी के रास्ते लोनी तक पहुंचाई जाती है। वहां इस शक्कर का इस्तेमाल बताशे बनाने में होता है।
गन्ने के खेतों से निकलकर कोल्हुओं तक पहुंचने वाला गन्ना, उससे तैयार होने वाली शक्कर और फिर बाजारों तक पहुंचता यह उत्पाद गांव को आसपास के व्यापार से जोड़ता है।

यहां की कहानी में एक दिलचस्प समानता भी है।
एक तरफ गन्ने से शक्कर बनती है, जो बाजार में मिठास पहुंचाती है। दूसरी तरफ गांव की पुरानी परंपरा है, जो रिश्तों में मिठास बनाए रखती है।
डालमपुर की पहचान में दोनों का अपना महत्व है।
गांव की अर्थव्यवस्था खेती से जुड़ी है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक पहचान उन रिश्तों से भी बनती है, जिन्हें यहां के लोग पुरखों की निशानी मानकर संभालते हैं।

डालमपुर के लोग, जिन्होंने गांव को दी अलग पहचान
डालमपुर का संबंध सेना और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों से भी बताया जाता है।

मेजर जनरल रणवीर सिंह पूनिया इसी गांव के रहने वाले हैं। वहीं सुभाष प्रधान मेरठ में भूमि विकास बैंक के चेयरमैन रह चुके हैं।
गांव में मित्तल वैश्य समाज के करीब चार परिवार भी रहते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, ये परिवार भी पहले खेती-किसानी से जुड़े थे। इनमें से एक व्यक्ति एनटीपीसी में बड़े पद पर कार्यरत रहे हैं।
ये उदाहरण बताते हैं कि गांव के लोगों की पहचान केवल खेती तक सीमित नहीं रही। समय के साथ लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों में भी अपनी जगह बनाई।
फिर भी डालमपुर की कहानी में सबसे अलग स्थान उस परंपरा का है, जो किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे गांव की सामूहिक विरासत है।

तीन सौ साल बाद भी कायम है पुरखों की निशानी

समय बदलता है। गांवों में पक्के मकान बनते हैं। खेतों में खेती के तरीके बदलते हैं। नई पीढ़ी पढ़ाई और नौकरी के लिए बाहर जाती है। रिश्तेदार दूर-दूर बस जाते हैं। जीवन की रफ्तार पहले से तेज हो जाती है।
लेकिन कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं, जो समय के साथ खत्म होने के बजाय लोगों की पहचान बन जाती हैं।
डालमपुर की दोनों बाक्खल की दावतें ऐसी ही परंपरा हैं।

यहां मां पार्वती और मां अन्नपूर्णा की पूजा होती है। गंगा स्नान के बाद कुलदेवता को जल चढ़ाया जाता है। कढ़ी और फुल्के का भोग लगता है। घर-घर से मट्ठा आता है। महिलाएं मिलकर भोजन बनाती हैं। एक बाक्खल दूसरी को बुलाती है और फिर दूसरी बाक्खल मेजबानी करती है।
इन सभी गतिविधियों को जोड़ने वाली कड़ी है—साथ बने रहने की भावना।

इस परंपरा को निभाने वाले लोग शायद इसे किसी बड़ी सामाजिक उपलब्धि की तरह न देखते हों। उनके लिए यह वही काम है, जो उनके पूर्वज करते आए और जिसे वे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं।
लेकिन गांव की चौपाल से बाहर निकलकर देखें तो यही साधारण-सा व्यवहार असाधारण बन जाता है।

क्योंकि समाज को जोड़ने के लिए हमेशा बड़े भाषणों की जरूरत नहीं होती। कई बार एक-दूसरे के घर की दावत, मिलकर तैयार किया गया भोजन और पीढ़ियों से निभाया जा रहा एक वादा ही काफी होता है।

डालमपुर की सबसे बड़ी मिठास
मेरठ का डालमपुर अपनी शक्कर के लिए जाना जाता है। यहां के कोल्हू गन्ने को शक्कर में बदलते हैं और वह शक्कर बाजारों तक पहुंचती है।
लेकिन डालमपुर की एक और मिठास है, जिसे किसी मंडी में नहीं तौला जा सकता।

यह मिठास है छोटी बाक्खल और बड़ी बाक्खल के रिश्ते में। यह उन महिलाओं के सहयोग में है, जो मिलकर दावत का भोजन तैयार करती हैं। यह घर-घर से इकट्ठा होने वाले मट्ठे में है। यह उस न्योते में है, जिसके जरिए एक परिवार नहीं, बल्कि एक पूरी बाक्खल दूसरी बाक्खल को अपने साथ जोड़ती है।

तीन सौ साल से अधिक समय से चली आ रही इस परंपरा की असली ताकत शायद यही है कि इसमें भाईचारा किसी नारे के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार के रूप में मौजूद है।

डालमपुर की कहानी हमें बताती है कि गांव केवल घरों और खेतों का समूह नहीं होता। गांव उन रिश्तों का नाम है, जिन्हें लोग पीढ़ियों तक निभाते हैं। और जिस गांव में तीन सौ साल बाद भी एक बाक्खल दूसरी बाक्खल को दावत देने का इंतजार करती हो, वहां की मिठास को सिर्फ शक्कर से नहीं मापा जा सकता।

डालमपुर निवासी एडवोकेट जयराज सिंह , सुभाष प्रधान , बेगराज सिंह जगत सिंह , ऋषिपाल सिंह हरबीर सिंह ने बताया कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को अब नई पीढ़ी भी बखूबी निभा रही है ।
वीर सैन, सूरज बली महेंद्र आजाद पाल मांगेराम महक सिंह कहते हैं कि अब गांव बदल रहे हैं लेकिन उनके गांव डालमपुर की नई पीढ़ी अपनी पहचान और संस्कृति को लेकर बहुत जागरूक है ।
