Report by : Dr. Ravindra Rana
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बूढ़पुर में मौत की फसल: रमाला मिल के ज़हर में डूबता बागपत का एक गांव

Dr. Ravindra Rana / Rajesh Sharma

बागपत के बूढ़पुर गांव में मौतें हो रही हैं — एक-एक कर, खामोशी से।
12 लोग मारे गए। कई परिवारों ने अपने जवान बेटे, बुजुर्ग माता-पिता और खेतों में पसीना बहाते किसान को खो दिया। गांव में हर गली में बीमारियां हैं — लकवा, दिल के दौरे, हड्डियों की कमजोरी, त्वचा की जलन। और गांव के बीचोंबीच बहता है एक काला नाला — रमाला शुगर मिल का वेस्ट वॉटर आउटलेट।

यह वही नाला है, जिसके पानी से गांव के खेत सींचे जाते हैं, जिससे नलकूप भरते हैं, और जिससे अब ज़िंदगी नहीं, मौत उगती है।

हमने सवाल उठाए… जवाब मिला – “यह एक ऑर्गेनिक आधारित उद्योग है”

जब हमने क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी भुवन यादव से इस भयावह स्थिति पर उनका पक्ष जानना चाहा तो कहा गया:

“यह एक ऑर्गेनिक आधारित उद्योग है, इसलिए ऐसी घटनाओं की संभावना नहीं है।”
“हार्ट अटैक किसी और वजह से भी हो सकते हैं।”

ऑर्गेनिक मिल का ज़हरीला सच: बूढ़पुर गांव में 12 मौतों के बाद भी प्रदूषण विभाग बेखबर!

यानी ज़हर बह रहा है, लोग मर रहे हैं — पर अधिकारी “संभावना” और “प्राकृतिक मौत” का चश्मा पहनकर देख रहे हैं।


हमने 10 सवाल पूछे, जिनका जवाब अब पूरे जिले को चाहिए:

  1. क्या “ऑर्गेनिक आधारित उद्योग” का मतलब यह है कि वह ज़हर नहीं घोल सकता?
  2. अगर पानी सुरक्षित है, तो नलकूपों का पानी काला क्यों हो रहा है और खेतों की फसलें क्यों सूख रही हैं?
  3. क्या रमाला मिल के पानी की BOD और COD रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है?
  4. क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गांव जाकर खुद सच्चाई देखी, या सिर्फ मिल की फाइलें देखीं?
  5. क्या आपकी जिम्मेदारी केवल मिल को क्लीनचिट देना है या जनता की सेहत की भी कोई कीमत है?
  6. गांववालों में अचानक दिल के दौरे, लकवा और हड्डी की बीमारियां क्यों बढ़ीं? क्या कोई स्वास्थ्य सर्वे कराया गया?
  7. क्या आपने मिल के अपशिष्ट जल की वैज्ञानिक जांच कराई है? उसकी रिपोर्ट कहां है?
  8. क्या आपने रमाला मिल को कभी नोटिस दिया? क्या उन पर कोई कार्रवाई हुई?
  9. क्या प्रदूषित पानी खेतों और जलस्रोतों में बिना ट्रीटमेंट के छोड़ा जा रहा है?
  10. क्या आप “संभावना नहीं है” जैसे शब्दों के पीछे छिपकर मौतों की जिम्मेदारी से बच सकते हैं?

गांव कहता है: हमें डॉक्टर नहीं चाहिए था, हमें मौत का कारण बंद चाहिए था।

जब मौतें हुईं, तो विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं आए ,खानापूरी करने के लिए स्टाफ कैमरे के सामने भेजा गया। ताकि कहा जा सके – “प्रशासन पहुंच गया है।”
सीएमओ ने कहा – “ये मौतें 15 दिन में नहीं, तीन महीने में हुई हैं।”
जैसे आंकड़ों से ज़हर का असर खत्म हो जाएगा।

गांव अब केवल आंकड़े नहीं चाहता — वह जवाबदेही चाहता है

बूढ़पुर गांव की मांगें बिल्कुल साफ हैं:

  • रमाला मिल की स्वतंत्र जांच और पानी-मिट्टी की लैब रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
  • मिल के अपशिष्ट जल पर सख्त कार्रवाई हो।
  • स्वास्थ्य जांच और मेडिकल राहत कैंप तुरंत लगाए जाएं।
  • राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय की जाए।

निष्कर्ष नहीं, चेतावनी:

अगली मौत अगर हुई…
तो उसका गुनहगार कोई बीमारी नहीं —
बल्कि वो सिस्टम होगा जो ‘संभावना नहीं है’ कहकर मौतों की ज़िम्मेदारी से बचता रहा।

बूढ़पुर की चीख़ अब सिर्फ गांव की नहीं — यह पूरे प्रदेश के “विकास बनाम ज़हर” की बहस का आइना बन चुकी है।