Report by : Dr. Ravindra Rana
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सर्दियों का स्मॉग संकट — मानव निर्मित आपदा : दम घुटने का मौसम

मेहर ए आलम ख़ान
सलाहकार, सिनेइंक पॉडकास्ट्स, लंदन
मुख्य संपादक, मासिक नर्सरी टुडे’, नई दिल्ली

हर साल जब उत्तरी भारत में सर्दियां आती हैं, तो हवा धुएं और धूल से भारी हो जाती है। जो मौसम शांत और सुखद होना चाहिए, वह अब घुटन का मौसम बन गया है। मैदानों के शहरों और गांवों पर धुंध की मोटी परत छा जाती है, जो उठने का नाम नहीं लेती। यही है स्मॉग — धुएं और कोहरे का मिश्रण। यह तब बनता है जब वाहनों, कारखानों और पराली जलाने से निकलने वाले प्रदूषक जमीन के पास ही फंस जाते हैं। सर्दियों में ठंडी हवा और धीमी हवाएं इन प्रदूषकों को ऊपर उठने और फैलने से रोकती हैं। नतीजतन, हवा में PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण भर जाते हैं, जो फेफड़ों और रक्त प्रवाह में पहुंचकर अस्थमा, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

सर्दियों का स्मॉग संकट — मानव निर्मित आपदा : दम घुटने का मौसम

दिल्ली इस संकट का सबसे बड़ा शिकार है। हर सर्दी में दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) “गंभीर” स्तर को पार कर जाता है, अक्सर 400 से भी ऊपर पहुंच जाता है। स्कूल बंद हो जाते हैं, उड़ानें रद्द या विलंबित होती हैं, और अस्पताल सांस लेने में तकलीफ झेल रहे मरीजों से भर जाते हैं। लेकिन यह समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। लखनऊ से लेकर लुधियाना तक, पूरे इंडो-गंगेटिक मैदान के शहर इस जहरीली हवा का सामना हर साल करते हैं। कारण सबको पता हैं। वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि सार्वजनिक परिवहन उसी गति से विकसित नहीं हो पाया है। डीज़ल इंजन जहरीली गैसें और सूक्ष्म कण छोड़ते हैं।

सर्दियों का स्मॉग संकट — मानव निर्मित आपदा : दम घुटने का मौसम

फसल कटाई के बाद पराली जलाना संकट को और बढ़ा देता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान धान की कटाई के बाद बची पराली को जल्दी खेत साफ करने के लिए जला देते हैं। यह धुआं सैकड़ों किलोमीटर तक फैलकर औद्योगिक और शहरी प्रदूषण में मिल जाता है। निर्माण स्थलों से उठती धूल, कारखानों से निकलता धुआं, और ठंडी रातों में कचरा जलाने की आदत — ये सब मिलकर हवा को जहरीला बना देते हैं, जिसे हर रोज़ करोड़ों लोग सांस के साथ अंदर ले रहे हैं।

यह संकट जटिल दिखता है, पर यह असाध्य नहीं है। समाधान हमारे पास हैं — जरूरत है तो केवल निरंतर प्रयास, स्पष्ट नीति, और ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की।
सबसे पहले, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाना और विश्वसनीय बनाना जरूरी है। स्वच्छ ईंधन और विद्युत वाहनों को पुराने डीज़ल इंजनों की जगह लेनी चाहिए। कारपूलिंग, बेहतर ट्रैफिक प्रबंधन और सख्त वाहन उत्सर्जन जांच लागू की जानी चाहिए। पुराने, प्रदूषित वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाना होगा।

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किसानों को इस समस्या के बारे में जागरूक करना और उन्हें सस्ती व व्यावहारिक विकल्प देना भी जरूरी है। जैसे कि हैप्पी सीडर मशीन, जो पराली जलाए बिना खेत साफ कर सकती है। सरकारों को फसल अवशेषों के बायोफ्यूल, खाद या पशु चारे के रूप में उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। दीर्घकाल में किसानों को धान के अलावा अन्य फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि यह व्यवस्था टिकाऊ बने।

निर्माण स्थलों को धूल नियंत्रण के नियमों का पालन करना चाहिए, जैसे कि सामग्री को ढकना और पानी का छिड़काव करना। कारखानों में फिल्टर लगाना और स्वच्छ तकनीक अपनाना अनिवार्य हो। धीरे-धीरे देश को कोयले से चलने वाली ऊर्जा से हटकर सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ना चाहिए।

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वायु प्रदूषण सीमाओं पर नहीं रुकता। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को एकजुट होकर एक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना के तहत काम करना चाहिए। नियमित निगरानी, खुला डेटा साझा करना और कानूनों का सख्त पालन आवश्यक है।
लोग भी योगदान दे सकते हैं — कार का उपयोग कम करना, कचरा न जलाना, और पेड़ लगाना। जनता की जागरूकता और भागीदारी ही स्थायी बदलाव ला सकती है।

वायु प्रदूषण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट है। बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर फेफड़ों वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं — यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
स्मॉग एक मानव-निर्मित आपदा है, और इसलिए इसे ठीक किया जा सकता है। भारत हर सर्दी को बीमारी के मौसम में बदलने की कीमत नहीं चुका सकता। अब समय है कि हम एकजुट होकर, संकल्प और निरंतरता के साथ, फिर से उन नीले आसमानों को वापस लाएं, जिनके नीचे हर नागरिक खुलकर सांस ले सके। ‎

सर्दियों का स्मॉग संकट — मानव निर्मित आपदा : दम घुटने का मौसम