Report by : Dr. Ravindra Rana
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अमर क्रान्तिकारी बाबा शाहमल सिंह जाट

लेखक- डा. सुशील भाटी

अमर क्रान्तिकारी बाबा शाहमल सिंह जाट

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में 4 जुलाई को पांचली और 9 जुलाई को सीकरी में हुई शहादत के बाद, मेरठ के आसपास माहौल कुछ शान्त हुआ, तो अंग्रेजों पश्चिम की ओर मुडे जिससे कि वे दिल्ली की फील्ड फोर्स के साथ अपने संचार को सुरक्षित कर सकें। बागपत में यमुना पर बना नावों का पुल इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण था। बाबा शाहमल मेरठ के पश्चिमी क्षेत्र बागपत . बडौत में क्रान्तिकारियांे के सर्वमान्य नेता थे, उनके निर्देश पर 3 हजार गूजरों ने 21 जून 1857 को बागपत के यमुना पुल को तोड दिया। जींद का राजा जो कि अंग्रेजों का सहयोगी था, उसके सैनिकों ने फिर से इस पुल का निर्माण किया परन्तु 27 जून को दिल्ली से आये विद्रोही सैनिकों और गूजरों नेे इसे फिर तोड दिया। इस प्रकार मेरठ और दिल्ली के बीच अंग्रेजों का सम्पर्क भंग हो गया था।

बाबा शाहमल बिजरोल गांव का मावी जाट जंमीदार था। इससे पहले भी वह बेगम समरू के समय किसानो के हको के लिये बगावत कर चुका था। मेरठ में सैनिक विद्रोह के तुरन्त बाद बागपत.बडौत क्षेत्र के लोगों ने बाबा शाहमल को क्रान्ति का नेता चुन लिया। 10 मई की रात में ही मेरठ जेल से छूटे हूए लोग, बाबा शाहमल के गांव पहुच गये 11 मई को निबाली गांव में चौधरी गुलाब सिंह के घेर में एक पंचायत हुई। जिसमें बाबा शाहमल के अतिरिक्त बाघू के अचल सिंह और निबाली के माधू सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित थे। इस पंचायत में सिसाना, बाघू, बली, खट्टादृडोला, टीकरी, सिंगावली, सैढभर, बालैनी, बूढ सैनी आदि गांवों के किसानों की उत्साही भीड इक्कठी हो गई। पंचायत में धाट पांचली से आये विद्राही भी थे। इस पंचायत में बाबा शाहमल को क्रान्तिकारियों ने अपना सर्वमान्य नेता चुना और उनके एक इशारे पर जान की बाजी लडा देने का आश्वासन दिया।

अमर क्रान्तिकारी बाबा शाहमल सिंह जाट

अगले ही दिन बाबा शाहमल ने बंजारों के एक कारवां पर हमला कर 500 खच्चरो पर लदा सामान अपने कब्जे में ले लिया। उसके तुरन्त बाद बडौत तहसील पर घावा बोल इसे नेस्तनाबूत कर दिया और बाजार को लूट लिया। इस धावे में अहैडा गांव के क्रान्तिकारी शाहमल सिंह के साथ थे। इस घटना के बाद बाबा शाहमल को मुगल बादशाह ने बागपत बडौत परगने को सूबेदार बना दिया। मई जून के महीने में बावली आदि गांवों के जाट भी उसके साथ जुड गये। मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर के अनुसार मीतल के नेतृत्व में 800 गूजरों ने बागपत पर हमला कर दिया। बागपत के लोगों ने आरम्भ में प्रतिरोघ किया और मीतल घायल हो गया। अततः जबरदस्त संघर्ष के बाद बागपत के लोगों ने बाबा शाहमल की सत्ता को स्वीकार कर लिया।

बागपत बडौत क्षेत्र में दिन पर दिन फैलते विद्रोह ने अंग्रेजों की चिन्ता बढ दी। बागपत में नावों का पुंल टूटने के अतिरिक्त एक बात जिसने अंग्रेजो की मुश्किलों को सबसे ज्यादा बढा दिया वह यह थी कि बागपत बडौत क्षेत्र से लगातार, अनाज आदि रसद इक्कठा करके दिल्ली के विद्रोहियो को भेजी जा रही थी। इस रसद की आपूर्ति के बिना दिल्ली के विद्रोही क्रान्तिकारी अधिक दिन तक नही टिक सकते थे।

इस स्थिति में अंग्रेज और अधिक दिन तक बाबा शाहमल की तरफ से बेपरवाह नहीं रह सकते थे। 16 जुलाई को खाकी रिसाले ने डनलप के नेतृत्व में बागपत क्षेत्र के लिये मार्च किया। रिसाले में लगभग 200 सिपाही थे, जिसमे 2 तोप, 8 गोलन्दाज, 40 राइफल धारी, 50 घुडसवार, 27 नजीब एव अन्य सिपाही थे। जब रिसाला हिन्डन के पास पहुचा तो उन्हे पता चला कि शाहमल सिंह अपने 3000 साथियों के साथ बासौद गांव मे है और अंग्रेजों के सहयोगी गांव डोला पर कल सुबह हमला करने वाले हैं। अंग्रेज 17 जुलाई की भौर में बासौद पहुॅच गये। लेकिन तब तक बाबा शाहमल अपने साथियों के साथ जा चुके थे। अंग्रेजों को बासौद में 8000 मन गेहूंदृदाल आदि मिला जो दिल्ली क विद्रोहियों को भेजा जाने वाले था। अंग्रेजों को गांव में जो भी मिला उसे गोली मार दी या फिर तलवार से काट दिया और गांव को आग के हवाले कर दिया। मुस्लिम गांव बासौद में लगभग 150 व्यक्ति शहीद हुए।

18 जुलाई की सुबह खाकी रिसाला डौला से पूर्वी यमुना नहर के किनारे किनारे बडौत की तरफ चल दिया। यह रास्ता जाटों की सलकलैन गौत्र के चौरासी गांवों की तरफ जाता है, इसे लोग चैरासी देस कहते है। डनलप कुछ सहयोगियों के साथ बर्का गांव में पहुचा, तो लोगों ने उन्हे चेेताया कि जितनी तेज भाग सकते हो भाग कर अपनी जान बचा लो क्योंकि शाहमल सिंह ने अपने साथ चैरासी देस को खडा कर लिया है। तभी शाहमल सिंह का भतीजा भगत सिंह उर्फ भगता अपने साथियों के साथ वहाँ पहुच गया और उसके साथ एक छोटे से मुकाबले में डनलप की जान पर बन आई और वह अपनी जान बचाने के लिए बडौत की तरफ भाग लिया। भगता ने उसका बडौत तक पीछा किया। अंगे्रजो ने देखा कि पूरा क्षेत्र उनके खिलाफ खडा हो गया है। चारों तरफ ढोल नगाडे बज रहे थे और हथियारबन्द लोगों के झुण्ड के झुण्ड बडौत की तरफ बढ रहे थे।

अमर क्रान्तिकारी बाबा शाहमल सिंह जाट

बडौत में क्रान्तिकारियों ने एक बाग में मोर्चा लगा रखा था, करीब 3500 क्रान्तिकारी बाबा शाहमल के साथ वहां अंग्रेजों से भिडने को तैयार थे। भारतीय बहादुरी से लडे परन्तु भारतीयों की देशी बंदूकें अंग्रेजी राइफलांे और तोपों का मुकाबला न कर सकी। भारतीय जान हथेली पर लेकर लडे पर विजय आघुनिक हथियारों की हुई। इस लडाई में करीब 200 भारतीय शहीद हुए। जिनमें बाबा शाहमल भी थे, जिन्हे एक अंग्रेज मि. तोन्नाकी ने दो भारतीय सिपाहियों की मदद से मारा था।
अंग्रेजों ने बाबा शाहमल का सिर काट कर एक लम्बे भाले पर लटका दिया। बाबा का सिर जहाँ अंग्रेजों के लिए विजयी चिन्ह था, वहीं भारतीयों के लिए वह क्रान्तिकारी ललकार और सम्मान का प्रतीक था। इसलिए उन्होनें इसे वापिस पाने के लिए अंग्रेजो का हिंडन तक पीछा किया।

बाबा शाहमल शहीद हो गये किन्तु क्रान्ति जिंदा रही, एक महीने बाद उनके पोते लिज्जामल के नेतृत्व में बागपतदृबडौत क्षेत्र में फिर से विद्रोह हो गया।………………………………….

सन्दर्भ-

  1. गौतम भद्रा, फोर रिबेल्स ऑफ एट्टनी फिफटी सेवन ;लेख, सब – आल्टरन स्टडीज, खण्ड.4सम्पादक. रणजीत गुहा
  2. डनलप, सर्विस एण्ड एडवैन्चर ऑफ खाकी रिसाला इन इण्डिया इन 1857.58
  3. नैरेटिव ऑफ इवैन्ट्स अटैन्डिंग दि आउटब्रेक ऑफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड रेस्टोरेषन आॅफ अथारिटी इन दि डिस्ट्रिक्ट ऑफ मरेठ इन 1857.58
  4. एरिक स्ट्रोक, पीजेन्ट आम्र्ड
  5. एस0 ए0 ए0 रिजवी, फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश खण्ड.5।6. ई0 बी0 जोशी, मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर